चंडिका देवी मंदिर: जहां चंड राक्षस का देवी ने किया संहार

फीचर डेस्क। ये हैं महोबा वासियों की आराध्य देवी बड़ी चंडिका। शायद ही ऐसा कोई हिन्दू हो जो नवरात्रि में इनके दरबार में जाकर अपना शीश न नवाता हो पर ये बहुत कम लोग जानते हैं कि गोरखगिरी की एक विशाल चट्टान पर उकरी 18 भुजाओं वाली बड़ी चंडिका देवी की इस 12 फुट ऊंची मूर्ति की पहचान सबसे पहले गहरवार नरेशों के समय 7वीं शताब्दी में हुई थी। ये तो पता नहीं चल सका कि सबसे पहले किसने देवी के इस अदभुत रूप को देखा जिसमें वे अपने पैरों के नीचे चण्ड दैत्य को दबाए हुए हैं लेकिन प्रथम चंदेल राजा चंद्र वर्मन ने अपने पिता भगवान चंद्र देव के निर्देश पर खजुराहो से महोबा आकर सन 831 में मदन सागर के तट पर यहीं विशाल यज्ञ करवाया था और देवी शक्तिपीठ की स्थापना की। शक्ति पीठ के पीछे पहाड़ पर जैन तीर्थंकर, कंठेश्वर मंदिर, खखरामठ व छोटी चंडिका देवी शक्तिपीठ हैं। पौराणिक कथाओं में ताराचण्डी सिद्ध पीठ के रूप में इस शक्ति पीठ का उल्लेख मिलता है। जो बाद में बड़ी चंडिका के रूप में मशहूर हो गई। 51 शक्ति पीठों में देवी ताराचण्डी भी एक है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार उत्तराखंड में दैत्य महिषासुर के सेनापति चण्ड से देवी ताराशक्ति का घोर संग्राम हुआ। चण्ड किसी तरह अपनी जान बचाकर विन्ध्य पर्वत शृंखला की ओर भागा। देवी ताराशक्ति ने उसका पीछा किया और यहीं उसका वध कर दिया। अगर आपने गौर किया हो तो मां चंडिका अपने पैरों तले उसी चण्ड राक्षस को दबाए दिखती हैं। महोबा के शूरवीर आल्हा ऊदल पर भी मां चंडिका की विशेष कृपा रही। महोबा छतरपुर रोड पर स्थित इस शक्ति पीठ पर सुबह 4 बजे से भक्तों का तांता लग जाता है।

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