बिना रार के हैं गुजरात में मुस्लिम मत

 

 

विशेष संवाददाता, अहमदाबाद। गुजरात में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है और कांग्रेस-बीजेपी दोनों ही दलों के नेता ताबड़तोड़ प्रचार में लगे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल मंदिर-मंदिर जा रहे हैं और पीएम नरेंद्र मोदी भी वोटर्स को लुभाने में लगे हैं। एक वर्ग जिसपर न तो कोई चुनावी बयान दिया गया है और न ही उसके विकास से जुड़ा कोई वादा किया गया है, वह है गुजरात का मुसलमान। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या गुजरात चुनाव में मुस्लिम वोटबैंक महत्वहीन हो गया है?
एमएस विश्वविद्यालय में फिजिक्स के रिटायर्ड प्रफेसर डॉ जेएस बंदूकवाला ने गुजरात में 2002 में हुए दंगों में अपना सबकुछ खो दिया था। उनके पुराने और अच्छे दोस्तों के अलावा विश्वविद्यालय के सहयोगियों ने भी उनके लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए और उन्हें भी नफरत का शिकार होना पड़ा। बंदूकवाला के मन में आज भी कोई कड़वाहट नहीं है और वह मुस्लिम युवाओं को पढ़ाने के लिए एक ट्रस्ट चला रहे हैं। गुजरात के चुनावों में 2002 के दंगे हमेशा से ही एक मुद्दा बनते रहे हैं लेकिन इस बार चुनावों में इसका जिक्र तक नहीं हुआ। गुजरात के चुनाव प्रचार में धर्म से जुड़े मुद्दों पर भी खूब बयानबाजी हुई, लेकिन गुजरात के दस प्रतिशत मुसलमानों की याद किसी को नहीं आई। इसपर बंदूकवाला कहते हैं, मुसलमान हमेशा से ही अलग-थलग रहे हैं और उनका जिक्र राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए किया जाता रहा है। बंदूकवाला कहते हैं कि इस बार मुसलमानों को अकेला छोड़ दिया गया है और हमारी अप्रासंगिकता एक बुरी चीज नहीं है। मुस्लिमों पर निशाना साधने में हमेशा पीएम मोदी आगे रहे हैं लेकिन इस बार गुजरात के चुनाव बिना किसी जुबानी हमले के लड़े जा रहे हैं। गुजरात के मुसलमान अपनी आवाज नहीं उठा पा रहे हैं और शांत हो गए हैं, इस सवाल पर व्यापारी जुबैर गोपालानी कहते हैं, फिलहाल मुसलमान शांत हैं और उन्होंने अपना कार्ड छुपाकर रखा है।

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