हिन्दी की उपेक्षा को चुनावी मुद्दा बनाये

ललित गर्ग। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे चर्चित होने वाला आसन्न आम चुनाव क्या मुद्दाविहीनता, फूहड़ता, भाषाई अशिष्टता, निजी अपमान के लिये ही याद किया जायेगा? सवाल है कि क्या हमारी राजनीतिक बिरादरी राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े किसी मुद्दे पर कोई सार्थक या गंभीर बहस छेड़ेंगी? क्या लोकतंत्र का यह महापर्व अपने राष्ट्रीय अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये कोई ठोस उपक्रम के लिये जाना जायेगा? क्यों नहीं लोकतंत्र का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण अनुष्ठान अपने राष्ट्रीय प्रतीकों जैसे राष्ट्रभाषा हिन्दी, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय पक्षी आदि को…

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